संदेश

औचक

जब भी, निस्तेज आँखें और, सूखे होठ लिए बोझिल टांगों वाला इंसान जागता है उसी वक्त, ठीक उसी वक्त,,,,, छन्न से टूटता है आदमी !! -----रवि

कविता

उम्मीदों के साए में ---–---------------------------------------------- मेरे भीतर की झील में, अचानक फेंक दिया गया, एक कंकर जिसने पैदा नहीं की छपाक की ध्वनि हलचल मचनी थी सो मची वैसा ही गोल आवृत जैसा कि अमूमन हर कंकर शांत पानी में पैदा करता है इसबार यह आवृत सतही न था कम्पन तलहटी तक झिंझोड़ गया एक घुटी हुई चीख, छनाके से,स्वप्न तोड़ गयी सपनें..!! आंखों में सजती है और आँखों से ही बहती है, टूटने पर,,,,, सपनों का टूटना खेल नहीं आदमी टूटता है मगर हर बार टूटा हुआ आदमी मोम नहीं होता कि वक्त की तपिश में पिघल ही जाए चाबुक बन बरसता है समय की उघड़ी पीठ पर ताकि निरंतर दौड़ता रहे उम्मीदों का घोड़ा ..!! 【रवि】
साहित्य दर्शन ******************************* एकदिन वृद्ध कवि से मुलाकात हुई कुछेक गोष्ठियों की चर्चाओं पर बात हुई अचानक तरी उनकी तन गयी बातों की झरी थी जो झर गयी वाकया कहने लगे वे दम साधकर आँखे फट पड़ी मेरी यह जानकर बूढ़ी टाँगों ने साथ दिया न जब चलने में कीचड़ से सन गए वे सम्भलने में लदफदाते, हाँफते गन्तव्य को वे चल दिए पीड़ाओं को भूल, फिर साँस लिए चल दिए काव्य पाठ सहित सम्मान मिलने का जोर था युव-युवियों से चकमक आयोजन का होड़ था आयोजक की नजर ज्यों ही इन पर पड़ी तिरछी नजरों से बोला "गिरीश जी" कितनी बजाई घड़ी जाइये जल्दी से जाइए, होइए तैयार आप सहानुभूति की बात न हुई,इनका आना हो पाप कवि की बूढ़ी आँखों में क्षोभ था और रोष था दिल में कहीं न कहीं सम्मान का भी जोश था तनिक रुके वे साँस लिए फिर वे कहने लगे समारोह की सच बयानी धीरे से ढहने लगे खास लोगों के लिए, ए.सी. कमरे समर्पण हुए मुझ जैसों को तकिए में, साहित्य के दर्शन हुए ©रवि कुमार "रवि"
अभिमन्यु मरा नहीं *********************** अक्सर! एक मोड़ आता है व्यूहनुमा और आदमी इसमें उलझा हुआ व्यूह भेदने के तरीके खोजता है सनद रहे, समय की चाक पर घूमता हर आदमी अभिमन्यु है वह मरा नहीं ले रहा है साँसे तुझमें और मुझमें..!! ©रवि कुमार "रवि"
(1) मन की गिरह ************************** मेरे घर के पास ही है वह घर बचपन का था जो मेरा दूसरा घर जुड़ी है जिससे तमाम स्मृतियाँ बचपन की लड़ाई के संग स्नेह अपनेपन की सहेजा है उस घर से बहुत कुछ यूँ कहिए हर्ष - विषाद सबकुछ जब कभी मैं नहीं होता वहाँ बाल सखा खोजते आ जाते मेरे यहाँ घूमता रहा समय अपने अक्ष पर हम घूमते रहे समय की वक्ष पर हम घूमते रहे, समय घुमाता रहा बीते पलों को बस निहारता रहा अब, जब कभी चढ़ता हूँ अपने छत पर दिख जाता है अब भी बचपन का वो दूसरा घर घर वहीं है दालान वहीं है खेल का मैदान वहीं है पर, जीवन जीने की अर्थों पर हम फलांगते उनकी शर्तों पर इन घरों से दूर हुए विभक्त हुए मजबूर हुए स्मृतियों में बचपन हरे हो गए उफ़ !! हम अब बड़े हो गए... ©रवि कुमार "रवि"

जनपथ बोलता है

हम टूटे कि हालातों ने तोड़ा हमें वे टूटे कि पता था उन्हें टूटने की कीमत ----रवि

कविता

लेखकों/कवियों से----- ********************************* दुनिया की नजरों में पेट सबसे अहम मुद्दा है और उससे भी अहम् है पेट को ढोते रहना अगर आप लिखते हो तो लिखो खूब लिखो पर सनद रहे-- आप पेट और भूख की परिभाषा मत गढ़ना क्योंकि यह एक जटिल मुद्दा है, आप खो जाओगे इसमें ! भूख खौलती है पेट के भीतर ही भीतर और आप हैं कि भूख को महज भूख लिखते हैं.... कल देखा था, उस काले कलूटे छोकरे को आँतों के संग पिचके हुए पेट को लेकर इस नुक्कड़ से उस नुक्कड़ तक दौड़ रहा था शायद, भूखा था वह ! और उसे पता है भूख की भाषा, भूख की तड़प उसका खदकना खदकते भूख की तड़प में सनका हुआ वह छोरा लगा रहा था बोली उन पन्नों की, जिस पर भूख लिखा था आपने 10 रूपये किलो सुन रहे हो न आप हाँ, 10 रूपये किलो ...!! ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● ©रवि कुमार "रवि"