कविता
उम्मीदों के साए में
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मेरे भीतर की झील में,
अचानक फेंक दिया गया,
एक कंकर
जिसने पैदा नहीं की छपाक की ध्वनि
हलचल मचनी थी सो मची
वैसा ही गोल आवृत
जैसा कि अमूमन
हर कंकर शांत पानी में पैदा करता है
इसबार यह आवृत सतही न था
कम्पन तलहटी तक झिंझोड़ गया
एक घुटी हुई चीख,
छनाके से,स्वप्न तोड़ गयी
सपनें..!!
आंखों में सजती है
और आँखों से ही बहती है,
टूटने पर,,,,,
सपनों का टूटना खेल नहीं
आदमी टूटता है
मगर हर बार टूटा हुआ आदमी
मोम नहीं होता
कि वक्त की तपिश में पिघल ही जाए
चाबुक बन बरसता है
समय की उघड़ी पीठ पर
ताकि निरंतर दौड़ता रहे
उम्मीदों का घोड़ा ..!!
【रवि】
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मेरे भीतर की झील में,
अचानक फेंक दिया गया,
एक कंकर
जिसने पैदा नहीं की छपाक की ध्वनि
हलचल मचनी थी सो मची
वैसा ही गोल आवृत
जैसा कि अमूमन
हर कंकर शांत पानी में पैदा करता है
इसबार यह आवृत सतही न था
कम्पन तलहटी तक झिंझोड़ गया
एक घुटी हुई चीख,
छनाके से,स्वप्न तोड़ गयी
सपनें..!!
आंखों में सजती है
और आँखों से ही बहती है,
टूटने पर,,,,,
सपनों का टूटना खेल नहीं
आदमी टूटता है
मगर हर बार टूटा हुआ आदमी
मोम नहीं होता
कि वक्त की तपिश में पिघल ही जाए
चाबुक बन बरसता है
समय की उघड़ी पीठ पर
ताकि निरंतर दौड़ता रहे
उम्मीदों का घोड़ा ..!!
【रवि】
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