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अभिमन्यु मरा नहीं *********************** अक्सर! एक मोड़ आता है व्यूहनुमा और आदमी इसमें उलझा हुआ व्यूह भेदने के तरीके खोजता है सनद रहे, समय की चाक पर घूमता हर आदमी अभिमन्यु है वह मरा नहीं ले रहा है साँसे तुझमें और मुझमें..!! ©रवि कुमार "रवि"
(1) मन की गिरह ************************** मेरे घर के पास ही है वह घर बचपन का था जो मेरा दूसरा घर जुड़ी है जिससे तमाम स्मृतियाँ बचपन की लड़ाई के संग स्नेह अपनेपन की सहेजा है उस घर से बहुत कुछ यूँ कहिए हर्ष - विषाद सबकुछ जब कभी मैं नहीं होता वहाँ बाल सखा खोजते आ जाते मेरे यहाँ घूमता रहा समय अपने अक्ष पर हम घूमते रहे समय की वक्ष पर हम घूमते रहे, समय घुमाता रहा बीते पलों को बस निहारता रहा अब, जब कभी चढ़ता हूँ अपने छत पर दिख जाता है अब भी बचपन का वो दूसरा घर घर वहीं है दालान वहीं है खेल का मैदान वहीं है पर, जीवन जीने की अर्थों पर हम फलांगते उनकी शर्तों पर इन घरों से दूर हुए विभक्त हुए मजबूर हुए स्मृतियों में बचपन हरे हो गए उफ़ !! हम अब बड़े हो गए... ©रवि कुमार "रवि"